Abstract
श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित नवधा भक्ति के सिद्धान्तों को वर्तमान शिक्षा में समाहित करके विद्यार्थियों में एकाग्रता, समर्पण, अनुशासन, भावात्मक बुद्धिमत्ता तथा सकारात्मक दृष्टिकोण जैसे गुणों का विकास किया जा सकता है। इसके साथ ही मानवीय मूल्यों, सामाजिक समरसता और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना भी जागृत की जा सकती है। यह महापुराण बताता है कि भक्ति ही मनुष्य के लिए सर्वोत्तम श्रेयस्कर उपाय है तथा भक्ति को छोड़कर केवल ज्ञान के प्रयत्न से क्लेश ही प्राप्त होता है। नवधा भक्ति में श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन—ये नौ प्रकार शामिल हैं। यह शोधपत्र स्पष्ट करता है कि इन प्रत्येक सोपानों को शैक्षिक प्रक्रियाओं के माध्यम से जीवन में उतारा जा सकता है। उदाहरणस्वरूप, श्रवण से सक्रिय श्रवण एवं एकाग्रता, कीर्तन से मौखिक अभिव्यक्ति एवं रचनात्मकता, स्मरण से स्मृति एवं आत्मसात्करण, पादसेवन से सेवा भाव एवं सामाजिक जिम्मेदारी, अर्चन से अनुशासन एवं व्यवस्था, वन्दन से आदर एवं कृतज्ञता, दास्य से कर्त्तव्य निष्ठा, सख्य से सहयोगपूर्ण मित्रता तथा आत्मनिवेदन से पूर्ण समर्पण विकसित किया जा सकता है। इससे छात्रों का समग्र विकास (बौद्धिक, नैतिक, भावनात्मक एवं सामाजिक) संभव होता है तथा आधुनिक शिक्षा में व्याप्त मानसिक तनाव, अशान्ति एवं मूल्यहीनता जैसी चुनौतियों का समाधान भी प्राप्त हो सकता है।
References
श्रीमद्भागवत महापुराण. गोरखपुर: गीता प्रेस; वि.सं. 2076.
श्रीमद्भागवत महापुराण. खण्ड 2. गोरखपुर: गीता प्रेस; वि.सं. 2076. स्कन्ध 10, श्लोक 14/4.
श्रीमद्भागवत महापुराण. खण्ड 1. गोरखपुर: गीता प्रेस; वि.सं. 2076. स्कन्ध 4, श्लोक 29/38-40.
श्रीमद्भागवत महापुराण. खण्ड 1. गोरखपुर: गीता प्रेस; वि.सं. 2076. स्कन्ध 1, श्लोक 2/15.
श्रीमद्भागवत महापुराण. खण्ड 2. गोरखपुर: गीता प्रेस; वि.सं. 2076. स्कन्ध 11, श्लोक 27/7.
भोज पुष्पा. श्रीमद्भागवत महापुराण में नवधा भक्ति [पीएचडी शोधप्रबन्ध]. शोधगंगा.
पाठक देवनारायण, सिंह महिमा. श्रीमद्भागवत महापुराण में नवधा भक्ति का स्वरूप. ज्ञानशौर्यम इंटरनेशनल साइन्टिफिक रेफर्ड रिसर्च जर्नल. 2023;6(6):66-9. ISSN: 2582-0095.

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