Abstract
वर्तमान समय में विश्व अनेकों समस्याओं से जूझ रहा है—जैसे कि युद्धों की बढ़ती गति, हिंसा का प्रकोप, पर्यावरण संकट, नैतिकता का पतन, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, भौतिकवाद की वृद्धि और असमानता आदि। केवल अपने को विस्तारित एवं पोषित करने की स्वार्थपूर्ण एवं संकीर्ण धारणाएँ वैश्विक समस्याओं का मूल कारण हैं। मनुष्य की विशेषता ज्ञान है। ज्ञान का अर्थ जानकारियाँ (नॉलेज) नहीं हैं, अपितु ज्ञान का अर्थ—प्रज्ञा (विज़डम) है। ज्ञान के अभाव में मनुष्य चेतन होते हुए भी नीचे दर्जे में गिना जाता है। ज्ञान के कारण मनुष्य विचारशील और मननशील बन पाता है तथा अपने स्तर को ऊँचा उठाता है। ज्ञान की दो धाराएँ हैं और दोनों को ही बढ़ाना चाहिए। पहली धारा वह है जो हमें जीविका अर्जन योग्य बनाती है—उसे शिक्षा कहते हैं। शिक्षा का मूल उद्देश्य जीविकोपार्जन और जानकारियाँ हैं। दूसरी धारा वह है जो आत्मिकता व संवेदनाओं को दर्शाती है—उसे विद्या कहते हैं। पंडित श्रीराम शर्मा जी के अनुसार विद्या को ही विवेक, अध्यात्म विद्या, ऋतम्भरा प्रज्ञा, गायत्री एवं प्रज्ञा कहा गया है। विद्या का मूल उद्देश्य उचित और अनुचित का फर्क समझकर सदैव उचित को अपनाना है। इस शोध पत्र में यह प्रतिपादित किया गया है कि वैश्विक समस्याओं का स्थायी समाधान केवल शिक्षा व तकनीकी ज्ञान से संभव नहीं, अपितु विद्या व विवेक में निहित है।
References
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